Friday, November 18, 2016

Art Vibration - 441

Rajasthan Kabir Yatra 2016 

Friends I were on journey of six days , we called to that RAJASTHAN KABIR YATRA 2016 .

I was participated in that yatra as a visual artist but when I was part of that yatra  I did many work for care to others as a care taker .i was felt  my duty as a artist or as a human so I did that . here I have wrote to complete journey or that’s live movements in Hindi language . I sure  you will translate it for your reading by support of google translator or other online translator format..

 It is  my first long writing by observation of myself on a journey I sure  you will see and feel live visuals of  my journey in your vision when  you read it ..thanks 

  

तू बाचे कागद लिखी , मैं बांचू आँखों लिखी !
मित्रों ये शब्द है संत कबीर जी के जिसे मैं पिछले ३० वर्षों से जी  रहा हु अपने जीवन में और यहाँ इस ऑनलाइन नेटवर्क के माध्यम से जो की फेसबुक है , के जरिये लगातार १० वर्षों से मैं संत कबीर की भांति आपके साथ नियमित रूप से साझा कर रहा हूँ हिंदी गद्यान्श के जरिये सामाजिक साहित्यिक और रचनात्मक पलों को  मेरी समीक्षा , आलोचना , समालोचना  और सही को प्रोत्साहन के साथ वो भी आँखों देखि से , कागद लिखी से नहीं !
यहाँ भी मैं आँखों देखि राजस्थान कबीर यात्रा को आप के साथ साझा करने जा रहा हूँ प्रथम जुड़ाव से लेकर यात्रा के अंतिम पड़ाव  तक के छणो के साथ !
मुझे , जब भी कबीर यात्रा का  आगाज होता है तो एक ई मेल मिलता है,  प्रमुख ई मेल ! इस बार भी मिला ! फिर मुझे फोन आया गोपाल सिंह चौहान का जो की बीकानेर में होने वाली कबीर यात्रा के सूत्र धार बनते रहे है और है भी ! अब गोपाल सिंह को मैं  संयोजक कहूँ या निर्देशक कोई फर्क नहीं !  पर बीकानेर में होने वाली कबीर यात्रा के वे पहिये की धुरी के समान मुझे प्रतीत होते है !
मैंने समय निकालकर मास्टर गोपाल सिंह से भेंट की उनके लोकायन प्रकाशन कार्यालय में ! ऑफिस में दो कमरे एक में ऑफिसियल सामग्री दूसरे में कंप्यूटर की दो टेबल के साथ एक अतिरिक्त टेबल जिस पर हिंदी के विख्यात साहित्यकार मालचंद तिवारी जी बैठे थे ! उसी कमरे में आने जाने की क्रिया के साथ सहकर्मचारी लोकायन,  श्री प्रकाश  जी ( नाथ जी ) का आना जाना जारी था ! उनके आने जाने में  ही मेरा परिचय उन्हें दिया फिर मेरा वहाँ होने का कारण उन्हे बताया !  तो वे बोले गोपाल बीकानेर से बाहर है  श्री डूंगरगढ़ में ! इन्तजार की तीन घंटे में साहित्यकार श्री  मालचंद जी से बात हुई साहित्य कला और कबीर पर ! साथ में वही से जानकारी मिली की इस बार राजस्थान कबीर यात्रा के सहयोगी संत श्री दुलाराम कुलरिया जी , बीकानेर पुलिस , आचार्य तुलसी शांति प्रतिष्ठान नैतिकता का शक्ति पीठ और तेरापंथ भवन श्री डूंगरगढ़ भी है ! लोकायन ऑफिस में मैंने कई विज्ञापन सामग्री को भी देखा जो राजस्थान कबीर यात्रा के प्रचार प्रसार में उपियोग ली जाने वाली थी ! प्रथम दिन  लोकायन के कार्यालय में बीकानेर के कई कलाकार मिले  चित्रकार , संगीतकार ,वाद्य कलाकार ,गायक कलाकार जो की इस राजस्थान कबीर यात्रा में  अपनी अपनी भूमिका  निभाने को आतुर से नजर आये ! कलाकार दर्शन सिंह  पंजाब , राहुल ऑरा गुजरात , गायक नेहा सिंह मुम्बई , कमल किशोर जोशी बीकानेर , जयदीप उपाध्याय बीकानेर , मुकेश बीकानेर , मोहनलाल डूडी बीकानेर , बल्लभ पुरोहित बीकानेर , रवि शर्मा बीकानेर , अनिकेत कच्छावा बीकानेर , शंकर रॉय बीकानेर , राम भादाणी बीकानेर , गिरिराज पुरोहित बीकानेर ! ये आधारभूत यूनिट टीम या कलाकारों का समूह था जो राजस्थान कबीर यात्रा को सफल बनाने में प्रतिबद्ध होकर आया इस राजस्थान कबीर यात्रा में !
प्रथम दिन मास्टर गोपाल  सिंह से भेंट नहीं हो सकी पर जानकारी मिली की मुझे एक कैनवास पेंट करना है राजस्थान कबीर यात्रा के लिए ! मैंने सहमति दी और वो प्रतिबद्धता में कब तब्दील हुई मुझे पता भी नहीं चला ! गोपाल ने बहुत रचनात्मक तरीके से मुझे  राजस्थान कबीर यात्रा में जोड़ लिया ! खेर अगले दिन मैं  फिर पहुंचा लोकायन ऑफिस  वहाँ जाते ही मुझे गोपाल सिंह से मिलने का मौका मिला बात हुई कैनवास भी मिला पेंटिंग को ! मैंने वही बैठकर पेंटिंग  बनाने का सुजाव दिया जिसे गोपाल ने पसन्द  किया क्यों की वो मुझे रोकना चाहते थे कबीर यात्रा में !  रंग रोगन लेन को १००० रूपए भी पकड़ाए जिसके मैंने रंग ब्रश ख़रीदे वो ९०० रूपए के आये हिसाब पर्ची सहित गोपाल को सौंपी पेंटिंग  बनाने वाले दिन ! एक पेंटिंग बनते ही  मास्टर गोपाल ने मुझे एक और कैनवास  देते हुए कहा की आप दो पेटिंग बनाओ ! मैंने ५ -५  घंटे  सिटिंग में दो पेंटिंग बना दी ! मेरा सृजनात्मक कार्य मैंने समय पर सम्पन कर दिया ! काफी कलाकारों ने मेरे सृजन को देखा और उन्होंने भी एक एक कैनवास अपने सृजन आयाम में रचा राजस्थान कबीर यात्रा के लिए !
दिनाक ११ नवम्बर २०१६ से कबीर यात्रा आरम्भ होनी थी ! तो उससे पहले एक दो बार मैंने संध्या के समय लोकायन कार्यालय में वैचारिक रूप से अपनी उपस्थिति उनकी यात्रा की रूप रेखा में दी , उत्साह आत्मविस्वास और जोश भरने की मनसा से मैं  वह उनके साथ था रात्रि १ बजे तक करीब दो से तीन दिन तक रुका  ! इस बिच आये हुए यात्री लोगो की व्यवस्था में व्यस्त गोपाल सिंह के साथ आचार्य तुलसी शांति प्रतिष्ठान के कैंपस आशीर्वाद की व्यवस्था भी देखने का अवसर मिला जो यात्रियों के लिए सुकून भरी और आरामदायक थी !

११ तारिक को राजस्थान कबीर यात्रा का आगाज आचार्य तुलसी शांति प्रतिष्ठान नैतिकता का शक्ति पीठ से हुआ ! मैं समय पर पहुंचा  आचार्य तुलसी शांति प्रतिष्ठान वहाँ जाते ही हमेशा की भांति पहले पहल  आचार्य तुलसी की समाधी पर अपने आप को प्रस्तुत किया फिर आत्मिक संवाद आचार्य तुलसी से और उसके उपरांत यात्रा का हिसा बना ! एक व्याख्यान कबीर की लेखनी पर हुआ जिसमे पद्मश्री चंद्र प्रकाश देवल जी ने अपने शोध पत्र को सबके समक्ष रखा कबीर की आँखों देखि लेखनी पर ! व्याख्यान में साध्वी श्री कनक प्रिय जी भी उपस्थित थी तो महामंत्री एटीपीएस श्री लूणकरण छाजेड़ जी भी थे !
कबीर व्याख्यान के उपरांत भोजन आशीर्वाद भवन में एटीपीएस के द्वारा ! फिर मैं सीधे पहुंचा  वेटेनरी कॉलेज जहाँ राजस्थान कबीर यात्रा की प्रथम  संगीतमय संध्या का आगाज होने वाला था ! मैंने वहाँ  देखा कलाकार दर्शन सिंह और बीकानेर के वे सभी कलाकार जो की इस राजस्थान कबीर यात्रा के अंग थे वे जोर शोर से दीवाने आम को सझाने में व्यस्त थे ! कलाकार दर्शन समय की बंदिश से परेशां होते से नजर आये पर उन्हें मानशिक शांति  मेरी उपस्थिति से मैंने देने की  कोशिश की ये बात मैं  जनता हूँ या कलाकार दर्शन सिंह या फिर मेरा कबीर !
मंच सझते ही मैंने एक आर्टिफीसियल तंबूरे को अपने हाथ में लिया जिसे कलाकार दर्शन सिंह ने बनवाया था को लेकर स्टेज पर जाकर बैठ गया और एक फोटो दोस्त से खिंचवाया मैंने देखा मंच सझा के बाद कलाकार कैसा दिखेगा मंच पर बैठे हुए ! वो सही सझावट थी दर्शन की और उसकी पूरी  कलाकार टीम की सो दर्शन को बधाई भी दी ! वहीँ दीपा नाम की एक सहयोगी ने कबीर यात्रा की कुछ जैकेट भी सब को शेयर की जो की हिस्सा थे इस कबीर यात्रा में , एक सहयोगी के रूप में ,सो मुझे भी मिली एक जैकेट !
कबीर यात्रा की प्रथम प्रस्तुति संगीतमय प्रस्तुति दी हमारे शहर के सांसद और अब राजस्थान  केंद्रीय वित् मंत्री श्री अर्जुन राम मेगवाल जी ने वो पल ऐतिहासिक था उस मंच  का , राजस्थान कबीर यात्रा का ! बीकानेर के एस पी  डॉ अमनदीप कपूर जी ने मंच को संबोधित किया कबीर यात्रा से होने वाले सामाजिक लाभ को सबके सामने रखा और मैंने उन्हें  संजोके रख लिया अपने कैमरे में जब वे मंच से बोल रहे थे ! फिर मंच से एक के बाद एक कबीर वाणी के गायक ने प्रस्तुति दी जिसमे मुख्तियार अली , कलाकार अंकित ने दस्ताने कबीर प्रस्तुत की , कालूराम जी ने कबीर की हेली को प्रस्तुत किया ऐसे करके करीब एक बजे तक प्रथम दिन की यात्रा का कार्यक्रम कबीर की आत्म ध्वनि के साथ सम्पन हुआ !
दिनक १२ नवम्बर २०१६ राजस्थान कबीर यात्रा का  दूसरा दिन मैंने भी अगले चार दिन  अवकाश का मन बनाकर अपना ट्रेवल बैग तैयार कर लिया और पहुँच गया एटीपीएस जहाँ पहले आचार्य तुलसी के  दर्शन फिर कबीर सत्संग में शामिल हुआ उसके  उपरांत बसों में सामान व्यवस्थित रखवाने साथ में कलाकार  दर्शन सिंह के आर्ट वर्क जो की स्टेनशील था राजस्थान कबीर यात्रा टेक्स्ट का उसे सही तरीके से रखवाना और सही सलामत श्री डूंगरगढ पहुँचाना मेरे जिम हो गया था ! जिसे मैंने ठीक से पहुंचवा दिया मेरी आर्ट ट्रांसपोर्ट  आइडिया से सो थैंक्स टू मी !
करीब १ :३० पर हम एटीपीएस से तीन बसों में सभी कोई २०० यात्री बैठे और श्री डूंगरगढ़ पहुंचे मेरे साथ जूनियर स्वरुप सिंह भी हो गया इस यात्रा में जो मेरे साथ ही रहा अंतिम पड़ाव तक ! श्री डूंगरगढ़ में यात्रा का स्वागत बैंड बाजे से किया गया  एक गली से गुजरे तो मुस्लिम परिवार के महिला/ बच्चों / पुरुषों ने यात्रियों पर पुष्प वर्षा की स्वागत में , जो स्नेह और स्वागत का बहुत उत्साह और प्रेम भरा द्रश्य था  जिसे शायद कबीर अपने समय में रचने चाहते थे !
हम सभी यात्री श्री डूंगरगढ़ के तेरापंथ भवन में रुके रात्रि विश्राम और भोजन भी तेरापंथ भवन की व्यवस्था से था ! कार्यक्रम श्री डूंगरगढ़ के बस स्टेण्ड पर आयोजित किया गया ! उसी बस स्टेण्ड पर जहाँ  पिछले साल दो गुट  आपस में जगड़ लिये थे पर १२ तारिक को कबीर यात्रा के समय वहाँ  का द्रश्य प्रेम भाव से ओतप्रोत था ! पीपल के गटे  पर संगीत संध्या का मंच बना , कबीर वाणी को श्री डूंगरगढ़ में कलाकारों ने गुंजाया तो दर्शन ने आकाश में कलात्मक हंस उड़ाए चित्रकार विनय अम्बेर  ने हरप्रीत की गिटार धुन पर ऑन द स्पॉट पेंटिंग बनाई ( मैंने इस प्रकार की  पेंटिंग १९९९ में मिलेनियम पर बीकानेर के टाउन हॉल में बनाया था म्युसिक  विथ पेंटिंग के रूप में ) विनय अम्बेर ने मुझे मेरी अतीत की कलाकारी की भी याद ताजा  करवाई सो उन्हें साधुवाद भी दिया मन ही मन में !
एस पी  डॉ अमनदीप कपूर जी ने श्री डूंगरगढ़ में मंच को संबोधित किया और बोले की जिस पीपल के गटे  पर मैं  अभी खड़ा हूँ  एक साल पहले इसी जगह पुलिस ने वाटर कैन भेजी थी भीड़ को बिखेरने के लिए और कल एक वाटर कैन मैंने भेजी इस पीपल के पेड़ को धोने के लिए ( उनका यह वाक्य अपने आप में सारी  कहानी कह गया श्री डूंगरगढ़ की और वर्तमान में बदले उसके स्वरूप की ) !
१२ तारिक का रात्रि विश्राम हमने किया तेरापंथ भवन में पर मैं नहीं कर पाया  साथी गिरिराज पुरोहित साथ एक रूम  में ही थे ! वे सोये पर मैं नहीं  खराटे खर्रर्रर्र ख्रर्रर्र इतने जोर के थे की मानो हम हेलीकॉप्टर में हो ! कबीर उनके खराटे सुनते तो जरूर दो चार दोहे और एक दो वाणी खर्राटों पर लिख डालते ! हा हा
तो रात्रि या सुबह की ४ बजे कलाकार मुख्तियार अली जी की टीम को भूख लग गयी उनका एक साथी कलाकार जयदीप से बार बार खाने की व्यवस्था के लिए कह रहा था तो जयदीप भी बार बार ये पूछ रहे थे की आप कितने आदमी हो कितने आदमी हो ! आखिर कार पुलिस डिपार्टमेंट ने सुबह ४ बजे खाना  बनवाया और कलाकार मुख्तियार अली की पूरी टीम को कलाकार  जयदीप ने खाना खिलाया ! उस पल मैं  अपनी हँसी नहीं  रोक पाया जब जूनियर  स्वरुप सिंह  मुझे जयदीप और कलाकार मुख्तियार अली के साथी की मारवाड़ी में हुई खाने के लिए जो गुफ्तगू या संवाद था को सुनाया ! रोचक , रमणीय , उतेजक और दयनीय  ... ( आँखों देखा नहीं इस लिए लिख नहीं रहा सॉरी ) .
खेर १३ तारिक की सुबह मुझे एक और जिमेवारी गोपाल सिंह ने सौंपी की तीन बसों मे से एक बस को मुझे मोनिटर करना है ! राववाला गांव के लिए सो ७ : ३० बजे तक सभी यात्री बस में बैठ जावे मैंने अपनी बांसुरी वादन और मौखिक निवेदन से सब को जगाया नास्ता तेरापंथ भवन की व्यवस्था ने करवाया और ऐसे करते करते हम करीब ९ : ३० बजे श्री डूंगरगढ़ से रवाना हुए राववाला   गांव के लिए ! श्री डूंगरगढ़ एक यात्री अपनी मोटर साईकिल से आया जो ख़राब होने को थी उस यात्री का सिक्थसेंस काम कर रहा था ! मुझे बोला मैं बीकानेर पहुँचता  हूँ आप मुझे बस में  बिठालेंगे क्या बीकानेर से ? मैंने कहा क्यों नहीं आप म्युसियम चौराहे पर मिलना हमें और वो यात्री मेरी बस में बैठ राववाला  चले बीकानेर से !
रस्ते में बीकानेर के पास वेश्णोधाम  पर पानी बसों में रखवाया गया ! तो यात्री लोग चाय की होटल पर पहुंच गये चाय और कुछ और खाने को जैसे ही पानी भरा गया हमने सब को बस में बैठने को कहा !  इस बिच चाय वाले की चाय ठीक से बनी नहीं और यात्री वापस बस में बैठने लगे ! कलाकार नेहा सिंह भावुक हो गयी और मुझ से बोली की चाय वाले को पैसे देने चाहिए ! मैंने कहा भावुक न हो जब यात्री लोगो  ने चाय ली ही नहीं तो पैसे कैसे देवे और क्यों आप देवे ! उस समय  कलाकार नेहा के पास  छूटे नहीं थे वो बोली आप देदो चाय के पैसे मैं बादमे आप को दे दूंगी ( कितने सहज होते है कुछ कलाकार ) मैंने कहा अरे १० चाय ये दुकान वाला १० मिनिट में बेच लेगा दुकान वाले ने बात की नजाकत को समझा और कहा जी आप जाइये आप की बस रवाना हो रही है ! इतने में एक यात्री मेरी और आया भागते हुए और कहा की एक चाय मुझे देदो १० का नॉट पकड़ाया मैंने केतली से एक चाय कागद के कप डाली  वो लेकर भगा आधी चाय भाईसाहब के हाथ पर गिरी ! खेर दुकान दार  को चाय के अलावा काफी मजूरी हुई कचोरी और नमकीन से ! जो हमारी बस यात्रियों ने करवाई ! वहाँ से बस रवाना हुई और आकर रुकी स्टिकर पेस्टिंग वर्क के लिए स्टिकर कबीर यात्रा को लेकर विज्ञापन या पहचान पत्र कहूँ तो गलत नहीं होगा ! स्टिकर चिपके जब तक सभी यात्रियों को  केलों का अल्पाहार दिया गया !  समस्या ये हुई की केले के  छिलकों को कहाँ फेंका जाए ! कुछ यात्री लोग केले के  छिलके एकत्रित करने लगे और एक थैले  डाला !  मेरी बस में लाकर रख दिया ! मैंने उस थेले को एक गौ माता की आहार कुण्डी जो मुझे नजर आगयी में डाल कर फ्री हुआ और गौ माता को कुछ आहार दे पाया !
स्टिकर पेस्टिंग के बाद बसें जाकर रुकी गजनेर पुलिस थाने में ! जहाँ यात्रियों को विश्राम और खाना दिया गया ! गजनेर से होते हुए हम श्री कोलायत बाईपास होते हुए बज्जू और रणजीत पूरा से होते हुए गांव रावला पहुचे ! संध्या हो चुकी थी ! जाते ही सभी यात्रियों का विनम्र स्वागत किया गया ! हमने भी हाथ जोड़कर उन सब को प्रणाम किया ! स्कुल में हमें ठहराया गया खूब प्रेम से खातिरदारी आवभगत की गयी सभी यात्रियों की ! सब के लिए खाट ,बिस्तर और रजाई की व्यवस्था की गयी उस ठंडी रात में ! ( डेरा बनादिया गया यात्रियों के लिए ) ! स्कुल से कुछ दूर खुले मैदान में कबीर की वाणी और हेली के गायन का मंच दर्शन और उसकी पूरी टीम ने तैयार कर रखा था कबीर को  कलाकारों के लिए !    भोजन के उपरांत सभी यात्री कबीर वाणी  को सुनने  पहुंचे तो रावल गांव की बालिकाएं , महिलाएं पुरुष व बच्चे सभी पहुंचे कबीर की रचनाओं को अलग अलग गायकों की आवाज में सुनने ! माननीय श्री देवी सिंह  भाटी जी भी पहुंचे अपने पुश्तेनी गांव कबीर यात्रा को  देखने सुनने पर वे गायिका सबनम बिरमानी जी को नहीं सुन पाए ! प्रोग्राम में १३ तारिक को सबनम बिरमानी जी के गायन का कोई शेड्यूल नहीं होने के कारण ! ( मैंने भी शबनम बिरमानी जी से आग्रह या जानकारी दी की माननीय श्री देवी सिंह जी आप की आवाज में कबीर को सुनना चाहते है , पहले वे बोले कौन है देवी सिंह तो मैंने श्री देवीसिंह जी का परिचय दिया ! तो वे बोले मैं  नहीं गाऊँगी क्यों की आज मेरा प्रोग्राम नहीं  है और कार्यक्रम की मर्यादा भंग  करना ठीक नहीं ! उस रात मैं  भी गिरिराज पुरोहित की प्रताड़ना जो  की श्री डूंगरगढ़ में मेरे साथ हुई की भरपाई करने को करीब १२ :३० बजे डेरे आकर सो गया माननीय देवी सिंह जी के जाने के बाद ! कुछ अच्छे कलाकारों को कबीर को गाते हुए नहीं सुन पाया जिसका खेद रहेगा  पर ठीक से सो पाया उत्साह अगली सुबह मुझमे मुझे नजर आया !
१४ तारिक की सुबह कोई ६ : ३० बजे मैं जागा पत्रकार मित्र राजेश कुमार ओझा स्कुल के कमरे से बाहर आये मेरे पास आकर बोले अरे आप बाहर सोये मैंने कहा एक रत की नींद बाकि थी सो सर्दी का अहसास ही नहीं हुआ गहरी नींद में ! फिर मैंने अपने आप को स्टील की गिलास की खोज में लगाया मिली तो गर्म चाय पी घरेलु मात्रा में और उसके तुरंत बाद चलत फिरत शौचालय का जीवन में पहली बार अनुभव लिया राजस्थान कबीर यात्रा के मार्फ़त ! फिर गर्म पानी से खुले में स्नान छिपकर स्कुल की एक दिवार के पीछे ! और उसके बाद नास्ता और फिर से बस की मोनिटरिंग सभी यात्रियों को बस में बैठने के लिए प्रेरित करना बिठाना आदि आदि ! इस बिच कुछ यात्री बॉर्डर देखने गए एक कपल अपना सामान चारपाई पर छोड़ गए जिन्हें सौंपा था  वे भूल गए ! मेरी नजर पड़ी तो तीनो बसों को रोक कर जानकारी ली की ये सामान जो पीछे रह गया है किसका है ? ज्ञात हुआ बॉर्डर पर गए हुए कपल का है सो उसे बस में रखवाया तब तक गांव वालों ने विदाई के दौरान बेकपाइपर बजाने वाले को बुलाया तो  सबनम बिरमानी के साथ अन्य यात्री संगीत पर नृत्य करने लगे गांव वालो ने भी उनके साथ ताल से ताल मिलाकर नृत्य किया और इस तरह से राजस्थान कबीर यात्रा की राववाला  से सुखान्त विदाई हमने ली !   
राववाला की सड़क मानो एक विस्वास सड़क का , जिस पर बस चलती तो रेत पर ही है पर विस्वास ये रहता है की सड़क है ! गोवा से आये मोटर बाइकर की मोटर बाइक पुरे रस्ते खराब हुई या नहीं पर राववाला  की सड़क पर उनकी बाइक का टायर वो भी ट्यूब लेस टायर बस्ट हो गया तो फोटोग्राफर दिनेश कुमार ओझा ने बज्जू गांव से मिस्त्री को अपनी जीप में  बिठाकर लाया और उस बाइक को पुनः नए टायर ट्यूब वाली बाइक बनाकर श्री कोलायत लेकर आया !
श्री कोलायत में हमें मगरा प्रशिक्षण संसथान में ठहराया गया ठेठ राजस्थानी खाना  खिलाया जिसमे बाजरे की रोटी , मिसी रोटी , गेहूं की रोटी,  कड़ी, दाल , चावल , पापड़ ,खाखड़िये फली का साग , सांगरी का साग , लहसुन की चटनी ( मैं  लहसुन प्याज नहीं खाता  सो जिन जिन में लहसुन प्याज थे वो मैंने नहीं खाया )  खाना  खाने के बाद मैंने भी यात्रियों को स्काउट बॉयज के साथ खाना  खिलाया ! संगीत और गायन के हास्यास्पद तरीके से अपने हाथ से मैंने हलवे के ग्रास यात्रियों को खिलाये सब ने तृप्ति से खाना खाया फिर हम सब बसों में बैठ कर आये श्री कोलायत के बाजार में कार्तिक पूर्णिमा के मेले में और मेले से होते हुए सब लोग पहुंचे श्री कोलायत तहसील कार्यालय के आगे जहाँ राजस्थान कबीर यात्रा का मंच दर्शन सिंह और उसकी पूरी टीम ने दिप  माला के साथ समझाया था ! कार्यक्रम सबनम बिरमानी जी की गायकी से सुरु हुआ और करीब २ :३० बजे तक चला फिर वापसी मगरा प्रशिक्षण संसथान की और जहाँ समस्या ये आयी की कमरे  थे पर प्रयाप्त बिस्तर नहीं मुझे विचार आया की मैं और  स्वरुप सिंह सहयोग ये करे की बस में जाकर सो जाए ड्राइवर जी के साथ ! तो कलाकार राम और कमल भी साथ आये और साथ आये देल्ही के प्रमोद सक्सेना जी भी ! जैसे तैसे दो तीन घंटे नींद ली एक ही मुद्रा में सोते हुए बस में और सुबह ६ बजे मेरी आँख खुली ! ड्राइवर जी ने कहा चाय कब बनेगी ? जानकारी ली तो ज्ञात हुआ की यहाँ से सीधे रवानगी है चाय नास्ता गजनेर में होगा ! मुझे बात ठीक  नहीं लगी सर्दी में कलाकर नेहा सिंह , प्रेरणा पत्नी गोपाल सिह आदि गर्म पानी पिरहे थे चाय की जगह ! मैंने रसोइ बनाने वाले ( मेरे श्री कोलायत गांव के व्यक्ति ) से जानकारी ली की आप के पास चायपत्ती चीनी और गैस है क्या चाय बनाने को ?  वे सहज भाव से बोले है!  तो  उनसे आग्रह किया की आप मुझे मोटरसाइकिल देवे मैं  दूध लेकर आता हूँ ! साथी गिरिराज पुरोहित ने मेरे साथ आने की रूचि दिखाई हम बाइक पर गए श्री कोलायत के बाजार वहा से ५ किलो दूध लिया और फिर सब के लिए चाय उस ठण्ड में उपलब्ध करवाई और सब से थैंक्स रूप में शुभकामंनाए भी पायी ! श्री कोलायत से एक यात्री ने अपने गन्तव्य को जाने का निश्चय किया सो उन्हें बीकानेर की बस बिठाते हुए हमारी बस गजनेर थाने पहुंची ! गजनेर थाने में नाश्ता और फिर कबीर सत्संग की गयी ! सत्संग के उपरांत काफी स्कुल के बच्चे भी राजस्थान कबीर यात्रा में शामिल हुए ! वो मेरा पहला अनुभव रहा जब  मैंने देखा की पुलिस अपनी रचनात्मक ड्यूटी को पूरा करने को आगे आयी है ! ये यात्रा का चौथा दिन था ! हम गजनेर से बीकानेर और बीकानेर में एक यात्री हंसा गेस्ट हाउस से हमारी बस में बैठे ! हमारी बस देशनोक ( जहा सारे यात्री देशनोक आते ही बोले हमें चूहों वाला माता जी का मंदिर देखना है ! मैंने कहा अभी हम लेट हो रहे है आते हुए देखेंगे इस मंदिर को और दर्शन भी करेंगे ) ऐसे बस नोखा से होते हुए  मुलवास पहुंची ! संत दुलाराम कुलरिया जी के गांव !
मेरी दृस्टि से वो अंतिम पड़ाव था  कबीर यात्रा का ! मैंने वहाँ कबीर के उस दोहे को जिवंत चरितार्थ होते देखा जिसमे कबीर कहते है की ** बड़ा भया  तो क्या भय जैसे पेड़ खजूर ,पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर !
हमारे यात्री थे करीब २०० और ४०० लोगो के खाने की व्यवस्था की मांग की गयी मुलवास की व्यवस्था से ! वहा संत दुलाराम कुलरिया जी के परिवार वालो ने ५००० व्यक्तियों का खाना बनवाया भव्य पंडाल और मंच संझवाय ! खाने के उपरांत आये  प्रत्येक  व्यक्ति विशेष को एक एक रजाई ठण्ड से बचने के लिए मुहैया करवाई और कार्यक्रम के बाद अपने घर लेजाने को देदी ! वास्तव में मैंने बड़े होने की  परिभाषा संत दुलाराम कुलरिया जी के परिवार में देखि वे सच में बड़े है उनके संस्कार बड़े है उन्हें साधुवाद मेरी अंतर  आत्मा से क्यों की उन्होंने कबीर की आत्मा को जीवन में धारण किया हुआ है इस समकालीन परिवेश में ! मुझे भी एक रजाई दी गयी जिसे मैंने एक साधु जो वहॉ  आये थे उन्हें एक रजाई मिली एक रजाई की इच्छा साधु महात्मा जी ने और जाहिर की तो मैंने अपनी रजाई उन्हें समर्पित कर दी ! साधु महात्मा ने मेरे सर पर प्रेम से दया भाव से हाथ रख कर आशीर्वाद दिया वो अनुभूति अविस्मरणीय है मेरे लिए इस राजस्थान कबीर यात्रा में से !
मुलवास में संध्या के भोजन के बाद संगीत मय माहौल बना  शिव जी सुथार ( कलाकार जी ) ने कबीर यात्रा की संगीत मई संध्या का आगाज किया अपने अंदाज में और वो कबीर संध्या करीब चार बजे तक चली ताली बजाते  बजाते मेरे हाथ की एक ऊँगली में दरार भी पड़  गयी खून रीसा पर कबीर मय होने के उस पारलौकिक आनंद ने सब कष्टों से मुक्त करदिया था उन पलों में !
४ बजे अंतिम भजन स्थानीय गायक ने गाया  जिसका मनोबल मैंने बढ़ने की पूरी कोशिश की कुछ गिने चुने श्रोता गणों के मध्य ! एक दो फोटो भी लिए मंच के करीब जाकर फोटोग्राफेर दिनेश कुमार ओझा के कैमरे से ताकि गायक कलाकार का मन लगा रहे ! फिर कबीर संध्या के बाद मैं  और स्वरूप सिंह गए सोने को ! वहाँ देखा की हमारी जगह कोई और सो गया है हमारे बैग उनके तकिये बने है ! और जो खली जगह थी वहां  बालिकाएं और महिलाये सोई थी ! तो मुझे दिखा एक सोफा कम  बेड मैंने स्वरुप के साथ मिलकर उसपर रखे सारे चार्जिंग मोबाइल और तार हटाकर एक तरफ किये बड़े ही इत्मिनान से बिना किसी को जगाये!  फिर हमने उस सोफा कम  बेड को फैलाया और सोने ही वाले थे की निर्देशक गोपाल ने हमें रोका   वह हमारा बिस्तर  किसी और को देना चाहता था  ! पर वहां मैंने अपने आप को सख्त रखा और कहा  गोपाल  नहीं,  अब इस बिस्तर पर हम ही सोयेंगे क्यों की हमारे बिस्तर पर कोई और सो गया है और हम उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहते सॉरी ! गोपाल ने बात की नजाकत को समझा और वहाँ  से चले गए और हम सो गए गहरी नींद में मुलवास में !

१६ तारीख  की सुबह मैंने फिर से बांसुरी बजाई कुछ यात्रियों की डिमांड पर , देल्ही के प्रमोद सकसेना जी ने  विडियो शूट किया बांसुरी बजाते हुए और मुझे एक वाक्य कहा तुम्हारे जैसे बहुत काम लोग देखे है मैंने  ..... उनके उस वाक्य ने मेरी  आँखों में पानी लादिया !
मुलवास में नहाने के लिए स्नान घर कम थे सो समय बचाने  के लिए मैंने राववाला  वाले तरीके को पुनः अपनाया मैंने छत पर एक बाल्टी में ठंडा पानी भरा और नहाने चला गया ! नहाने  के बाद वापसी से पहले नास्ता किया फिर अन्य यात्रियों को भी नास्ता परोसा ताकि समय पर बस में बैठकर बीकानेर पहुंचे !
मुलवास से रवानगी होते ही नोखा आया तो कलाकार नेहा सिंह की माता जी श्रीमती रीता सेठ जी ने मुझे कहा की मेरी ४ :३०  की ट्रैन हे अम्बाला के लिए क्या हम समय पर बीकानेर पहुँच जाएंगे ? उस समय घडी में बजे थे २ :२० ! मैंने कहा कोशिश करते है पर मैंने   बाकि यात्रियों  को देशनोक माता का मंदिर दिखने का वादा जो किया है उसका क्या होगा ? पर समय की रचना और इस्वर का आशीर्वाद हर समस्या का हल रखता है मुझे भी मिला ! बस नोखा पहुँचती उससे पहले मुझे मेरी माता जी का फ़ोन आया की हम देश नोक पहुँच रहे है नोखा से निकले है ! मैंने कहा आप देशनोक रुके एक यात्री को बीकानेर स्टेशन उतारना होगा आप को ! मैंने रीता जी से कहा की आप समय पर बीकानेर स्टेशन पहुँच जाएंगे व्यवस्था हो गयी है इस्वर की कृपा से ! उधर गोपाल सिंह ने मुझे कॉल किया की तुम सीधे  बीकानेर आओगे मैंने कहा हम पानी पेशाब और दर्शन के लिए देशनोक रुकेंगे ! गोपाल ने साफ मना  किया की नहीं शेड्यूल बिगाड़ जाएगा ! मैंने कहा अगर रेल फाटक बंद हो जाए जो की रस्ते में दो पड़ते है तो क्या शेड्यूल उस से नहीं बदलेगा ? गोपाल ने कहा वो अलग बात है मैंने कहा ओके देखते है ! देशनोक आये तो हमें फाटक बंद मिला हा हा हा  विधाता का खेल और फाटक के उस पार मेरा छोटा भाई इन्तजार  कर रहा था मेरा और कलाकार नेहा सिंह जी की माता जी का ! रीता जी ने  बेटी नेहा सिंह को जो की दूसरी बस में बैठी थी को कहा नेहा मैं  जारही हूँ बीकानेर योगेंद्र की माता जी के साथ इनकी गाड़ी है ! रेल फाटक बंद था सो हम पैदल फाटक पार करके गए गाड़ी में उनका सामान रखा उन्हें कार में बिठाया ! रीता जी ने मुझे थैंक्स कहा तो मैंने कहा आप थैंक्स न कहे आशीर्वाद दे थैंक्स करणीमाता को देवे ! जय माता दी कहकर मैं  वापस  मेरी बस में ओर आ ही  रहा था की कलाकार जयदीप और गिरिराज पुरोहित ने मुझे रोका  और देशनोक न जाकर सीधे बीकानेर जाने को कहा ! मैंने उन्हें कहा हम बीकानेर जारहे है आप आगे चले मैं  पीछे आरहा हूँ आप के ! जयदीप ने बात को समझते हुए कहा तो आप देशनोक जाओगे मैंने कहा यस क्यों की मैंने सब से जाते समय वादा  किया था ! रही समय की बात वो इस रेल फाटक ने पूर्ण करदी ३० से ३५ मिनट यही ख़राब हो गए अब २० मिनट और ख़राब हो जायेंगे जो की होंगे नहीं तो क्या हो जायेगा ! इतने में फाटक खुला वे दो बसें बीकानेर की और गयी हमारी बस मुड़ी देशनोक की तरफ ! सब यात्रियों से विनती की की आप सब लोग सिर्फ मंदिर देखेंगे इधर उधर नहीं जायेंगे न ही कुछ खाएंगे पियेंगे ! सब ने सहयोग किया हम १५ मिनट में दर्शन करते हुए बस में आकर बैठे और हमारी बस चलपड़ी बीकानेर के लिए ! पलाना  पास होते ही मैंने गोपाल सिंह को एसएमएस किया की हम पलाना  पास कर चुके है अब बीकानेर ! गोपाल ने रिप्लाई  दी ओके  ... !
हंसा गेस्ट हाउस के पास मैं  और स्वरुप  उतरे मैंने मेरा हेलमेट एटीपीएस के ऑफिस से वापस लिया और मेरी आयरन चेतक भी फिर स्वरुप को उसके घर उतारते हुए मैं  मेरे घर गया ! माता जी से कलाकार नेहा की माता जी को सकुशल स्टेशन पहुँचाने की खबर ली और वापस लगा चाय पीकर तैयार होने में जुनागढ़ जाने को जहाँ राजस्थान कबीर यात्रा की अंतिम प्रस्तुति थी ! संगीत प्रस्तुति के उपरांत एस पी  डॉ अमनदीप सिंह जी ने मेरे चित्र को देखा मुझसे मिले हाथ मिलाया पर कहा कुछ नहीं उनकी आँखों ने काफी कुछ कहा उनके मौन से ! फिर उन्होंने सब को अपने यहाँ कॉफ़ी के लिए बुलाया ! हम बचे हुए यात्री कोई २० से २५ लोग जुनागढ़ से सीधे उनके घर गए जहा उन्होंने एक एक से व्यक्तिगत परिचय लिया  यात्रा के अनुभव को सुना ! मुझसे कहा अपने परिचय को देने का तो मैंने कहा मैं भारत से हूँ ,बीकानेर में मेरा घर  है,  मास्टर पेंटिंग में की है , फ्रीलांसर हूँ , कबीर को जीता हु ,कबीर को समझने की कोशिश में हूँ। इसलिए कबीर यात्रा में हूँ ! एस पी  डॉ अमनदीप कपूर जी से मैंने कहा की इस  यात्रा की पूरी ऑब्जर्वेशन के बाद मैं  आप के लिए ये कह सकता हूँ की मेरे बीकानेर को एक टीचर मिला है आप के रूप में ! करीब १ बजे से भी अधिक समय तक हम सब एस पी  डॉ अमनदीप कपूर जी के घर रहे सब ने अपने अपने अनुभव साझा किये और आगे भी इस प्रकार की यात्रा  रखने की बात की ! फिर हम सब को स्वयं अपने घर के  मेन  गेट तक विदाई देने आये ऐसे सजक नागरिक अधिकारी एस पी  डॉ अमनदीप कपूर जी को मेरा आर्मी सल्यूट !
और इस प्रकार  मैंने ६ दिन का एक लंबा अवकास सम्पन किया करीब ९ साल के बाद अपनी इस सृजनात्मक यात्रा में  राजस्थान कबीर यात्रा के जरिये  ...
बोलो संत कबीर की ..  जय हो




 


 






yogendra kumar purohit

Master of Fine Art   
 Bikaner,INDIA

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