Wednesday, October 30, 2013

Art Vibration - 251




DIALOGUE BY HINDI 
LITERATURE  TO HANSH

http://www.hansmonthly.in/index.php
Photo by google Image 
Friends yesterday I were knew a sad news about literature family . we lost to a very senior writer cum follower of great late writer MUNSHI PREM CHAND . yes we lost to writer  Rajendra yadav . in present he was editor of HINDI Literature  magazine HANSH. This literature magazine was creation of great late writer MUNSHI PREM CHAND , he was published first edition of HANSH magazine in year 1936 and he was publishing  continue till year 1956 .

After  Munshi Prem chand  writer  late Rajendra yadav  was started publication of HANSH magazine by his own efforts . I were knew this important information today evening  ( date 30-10-2013)   by a common meeting of Writers or creative peoples . we all were gave respect to work of Rajendra Yadav and we did prayed for his soul peace. That meeting was in`Sudarshana Kala Dirgha ( art gallery ) Bikaner,.

There many senior and junior writers were expressed his/her  view and observation on magazine Hansh or that’s editor late writer Rajendra yadav. I were listened  to all and collecting some more right information about history of Hansh Magazine or that’s editor .i were knew Hansh magazine was started  for Hindi story and that is promoting  to  Hindi story writer of my nation.
You can think why I am sharing this with  you by this blog post . so I want to tell  you its  region  why I am sharing it  with  you by this post.

Late Writer Rajendra yadav ji -
Photo by Google Image .
Before few month  I were wrote a real story of my life or that’s observation . I were converted a real live motion in form of Hindi literature by story format.

Because  my two close friends were published from HANSH magazine as a story writer  , writer Sanjay Purohit and Manish Kumar Joshi , I were read their stories  in HANSH  Magazine  then I were shared  my live story to editor of HANSH  writer Rajendra yadav . my story concept was sound of Mother by a bird  live life condition . I were lived  that live story,  I saw how to a mother care to her kid and what was  my role in that live story as a human  by time design . so I were shared that first live story to editor of HANSH  Magazine  by Email ..but that was not accepting for publication and I were not received any reply so I think that was in under process of publication or maybe that was a half dialogue of myself with HANSH  magazine or that’s editor .

 On online I am connected to page of writer late  Rajendra Yadav but there he was not informed  to me about  my story publication . it was critical but true .

when I were not received any reply of him then I were get a strong step for my story writing  work . today on online I  am connected on online with 20,000 to up  people of art and literature family . so as a freelancer creative person I were updated that live story of my life  on online networks for reading of connected  peoples.

Here I want to share with  you that story link but that  story text in HINDI , I hope  you will notice to my live story matter with a right or true live message or  life relation in nature .


https://www.facebook.com/photo.php?fbid=4983856268855&set=a.1159622585403.2025211.1072945182&type=1&theater

" उपकार या परोपकार "


( सत्य घटना पर आधारित है )

Photo by Yogendra Kumar Purohit
एक कलाकार जो हमेशा व्यस्त रहने वाला अपने सर्जन कर्म में , अपने सिमित कला संसाधन के साथ एक सरकारी कला भवन में बतौर एक स्वतंत्र कलाकार की हेसियत से जिसका स्रजन चित्र कला से पहचाना जाता था , बात उस दिन की है जब वो अपने कला कर्म को पूर्ण कर के सरकारी कला भवन के स्टूडियो को ताला लगाकर वहां से जा चूका था और जाकर बेठा अपने दोस्तों के साथ वही पुराणी अपने कोलेज के पास वाली चाय की थडी पर ! जहां अक्सर वो कलाकार चाय पिया करता कला परिचर्चा करते हुए अपने जूनियर और सिनियर के साथ ! उस दिन भी वो वेसे ही व्यस्त था चाय और कला परिचर्चा में ! उस पल एक दम से उसका मन विचलित हुआ उसे अजीब सा और आन्तरिक खिंचाव महसूस हुआ ! जो अचेतन मन से उसे सांकेतिक रूप से मिल रहा था ,और वो ये जनता था की जब भी उसके साथ ऐसा कुछ होता है तो वो कोई घटना को परिणाम देने वाली परिस्थिति होती है ! मनोविज्ञानं इसे सिक्स्थ सेन्स कहता है जो कलाकारों से नियमित सर्जन क्रिया से बनता है , पूर्वाभास किसी अद्र्स्य घटनाक्रम का ,वहां उसके सब साथी चाय और कला परिचर्चा में व्यस्त पर उसके मन पर दबाव बढ़ता जा रहा था वो कही खिचा चला जा रहा था ! कला कर्म पूर्ण कर चूका था सो वो समझ भी नहीं पा रहा था की ये दबाव क्यों हो रहा है ? पर वो था उसके मन पर , पर फिर भी वो शांत मन से दोस्तों के साथ व्यस्त होने की कोशिश में लगा ,पर असहज और अशांत भी था ! , 


इतने में उसका एक सिनियर अपनी नयी जीप लेकर उस चाय की थडी पर पहुचता है और उसे जीप में घुमने का न्योता देता है ! जबकि उस कलाकार के दोस्त को पता है की ये आर्ट में घुमने वाला है , कलाकार है मना ही करेगा क्योंकि इस से पहले भी कई बार वो मना कर चूका है ,अपने उसी दोस्त को ! पर उस दिन एक दम से वो कलाकार बोला चलो, पर जाऊंगा मै मेरे स्टूडियो अगर उधर जाते हो तो चल सकता हूँ , रविवार का दिन था सो उस दोस्त ने कहा जहा तू कहे दोस्त वही ले चलू पर तू चल तो सही मेरे साथ ! , वो दबे मन से सब को अलविदा कहकर कल फिर मिलने का अस्वासन देकर उस दोस्त की जीप में जाकर बेठ गया ! कुछ देर बाद वो सरकारी कला भवन भी आ गया उसके दोस्त आगे लेजाना चाहते थे उसे, पर वो बोल मुझे यही उतार दो आगे नहीं जाने का मन हो रहा! दोस्तों ने जाना की ये जायेगा स्टूडियो में और घिसेगा पेंसिल कागज पर , उन दोस्तों ने उसे वही जीप से उतरने दिया और वो जीप से उतर कर सीधा गया कण्ट्रोल रूम उस कला भवन के वहा से स्टूडियो की चाबी ली और मन के भीतर खिंचाव होते हुए भी मन बे मन से वो स्टूडियो की तरफ बढा और ताला खोला स्टूडियो का ! दरवाजे को धकेला और देखा की खूब सारे पीले रंग के छोटे छोटे फुल की पतियों के टुकड़े फर्श पर गिरे पड़े है और एक चिड़िया सांस भरति हुई रोशन दान की टूटी हुई सीमेंट की जाली से अन्दर आरही और अपनी चोंच में एक पीले रंग के फुल की पति दबाये हुए ! वहां एक बोर्ड जो दिवार पर टिका है उस पर जाकर बैठती है ! फिर कभी इधर कभी उधर उड़ उड़ कर अपनी परेशानी उस कलाकार को दर्शाने की कोशिश करती है ! उस कलाकार ने सोचा की ये चिड़िया क्या मेरे चित्र जो की उस बोर्ड पर टंगे थे जिनमे पीले रंग का प्रयोग किया गया था, शायद उस से प्रभावित होकर ये चिड़िया पीले रंग के फुल की पति तोड़ तोड़ कर यहाँ लारही है , पर अगले ही पल जब उस चिड़िया ने वो पीले रंग के फुल की पति बोर्ड के पिछे की और अपनी चोंच से गिराई तो कलाकार का कलात्मक ब्रहम टुटा ! उसने दुसरे तरीके से सोचना सुरु किया की क्या है इस बोर्ड के पीछे ? की ये चिड़िया बार बार उधर देख रही है और अपने चोंच का ये पीले फुल का टुकड़ा उधर गिरा रही है और गिराकर फिर बाहर जाकर एक और टुकड़ा फुल की पति का लेकर आरही है ! 

उसने इस गुथी को समझने के लिए चिड़िया के बहार जाने का इन्तजार किया जेसे ही इस बार चिड़िया बहार गयी की कलाकर ने फुर्ती से बोर्ड के पीछे जो दीवार से एक दम सट्टा हुआ था और ऊपर की और से दीवार से कुछ दूर और लोहे की तारो पर लटका था , उस कलाकार ने बोर्ड के पीछे देखा और पाया की एक छोटा सा चिड़िया का बच्चा बोर्ड के पीछे तार के गुछे में उल्जा हुआ है ! उस पल उस कलाकार के रोंगटे खड़े हो गए ये द्रश्य देख कर की एक माँ किस तरह अपने बच्चे को बचाने के लिए संघर्ष कर रही है , या उस के संघर्ष में कितनी मौन पर प्रभाव शाली पुकार है मदद के लिए की मुझे यहाँ आना पड़ा, ना आने का मन होने के उपरांत भी ! वो चिड़िया जानती थी की उसके बच्चे को अभी जीना है आत्म विश्वास का प्रमाण भी उस कलाकार ने उस चिड़िया के आत्मविश्वास और उसके प्रयास से जाना जब वो खाना अपने बच्चे तक पहुँचाने की कोशिश कर रही थी ,उन पीले फूलो की पतियों के टुकडो के सहारे या उन पीले रंग के टुकडो व् अपनी चहक के जरिये वो चिड़िया अपने बच्चे को आभास करवा रही थी की माँ तेरे पास है मेरे बच्चे और ये उम्मीद भी कर रही थी की सायद इन पीले फूलो के टुकडो को देख कर उसका बच्चा जो अभी उड़ना नहीं जनता वो उड़ने का प्रयास भी कर के बहार आजाये ! वो सारा द्रश्य देख कर उस कलाकार की आँखे नम हो गयी थी और वो मन ही मन बोला माँ की इस से बड़ी परिभाषा क्या होगी ? उस दिन उस कलाकार ने जाना की मन पर दबाव अकारण नहीं बनता है वो चिड़िया भी उसी स्टूडियो में अपना घोंसला बना कर रह रही थी और उसे उस कलाकार पर आत्म विश्वास था साथ ही एक प्राकृतिक रिश्ता जिव का जिव से , शायद तभी वो निडर भाव से अपने बच्चे को उसी स्थिति में छोड़ कर फिर से फुल का टुकड़ा लेने को उड़ गयी ! इस बार उस कलाकार ने समय का सदुपियोग किया बिना समय गवाए पहले बोर्ड को दीवार से दूर किया फिर एक टेबल उस जगह बोर्ड के निचे रखी जहां वो चिड़िया का बच्चा उल्जा हुआ था ! बोर्ड के उल्जे हुए तार को चिड़िया के बच्चे से अलग किया बच्चा सुरक्षित था, फिर एक कटोरी में साफ पानी भरा और उस टेबल पर रख दिया और इतने में कब वो चिड़िया स्टूडियो के दरवाजे पर आकर बेठी उस कलाकार को भी पता नहीं चला ! सायद वो माँ जानती थी की कलाकर का मन प्रकृति प्रेम वाला है या उसे भरोसा था की ये कलाकार उसके बच्चे का अहित नहीं करेगा ! कलाकार ने जब ये भांप लिया की अब ये बच्चा किसी भी रूप से असुरक्षित नहीं है तब उसने बिना उसे हाथ लगाये उस बोर्ड और टेबल से अपने आप को दूर कर लिया और वो चिड़िया उड़ कर अपने बच्चे के पास उस टेबल पर जाकर बेठ गयी और कलाकार ने उस चिड़िया से कहा अब संभाल लेना अपने बच्चे को ठीक समय पर मुझे पुकार लिया आज तुमने , ऐ प्रकृति की माँ , तुजे सत सत प्रणाम ! कलाकार ने फिर से स्टूडियो को ताला लगाया चाबी कंट्रोल रूम में सोंपी और केंटिन में जाकर सब दोस्तों को मोबाइल से हलके मन से और भरे स्वर में सन्देश भेजा ,कहा माफ़ करना दोस्तों आप सब को चाय के बिच छोड़ कर निकल आया पर मै आया नहीं था मुझे बुलाया था एक माँ की दर्द भरी पुकार ने ..

योगेन्द्र कुमार पुरोहित 
मास्टर ऑफ़ फाइन आर्ट 
बीकानेर , इंडिया

In that  live story I could got a real relation with  real bird life but after  register that  live story I could not got live relation with a human or story publisher . it was painful but there to a new story was started and here I am sharing with  you for  your visit and notice. I were feeling my writing work was got half dialogue with editor of HANSH magazine  writer late Rajendra Yadav  and in mid of dialogue he was leaved to our conversation on story writing in  Hindi literature about publication of Hansh .

When I were sitting in meeting of literature peoples in  Sudarshana kala Dirgha (  art gallery ) that time I were thought  today HANSH and my story is feeling alone condition without  that’s editor or publisher . maybe After  writer Munshi Premchand HANSH ( Bird name ) magazine was fling in sky of literature by wing of late writer Rajendra yadav and in future who will give his or her wing for flying to  HANSH magazine ? it is a question to our literature family by me . but it is  not only a question it is  my dialogue by Hindi Literature  to  HANSH publication team . 

 So I said dialogue by Hindi literature to HANSH ..

Yogendra  kumar purohit
Master of Fine Art
Bikaner, INDIA

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